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सतपुड़ा के घने जंगल - भवानी प्रसाद मिश्र | Satpura Ke Ghane Jungle - Bhawani Prasad Misr

सतपुड़ा के घने जंगल। नींद में डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। झाड़ ऊँचे और नीचे, चुप खड़े हैं आँख मींचे, घास चुप है, कास चुप है मूक शाल, पलाश ...

गीत अगीत - रामधारी सिंह दिनकर | Geet Ageet - Ramdhari Singh Dinkar

गीत, अगीत, कौन सुंदर है? गाकर गीत विरह के तटिनी  वेगवती  बहती  जाती है, दिल हलका कर लेने को उपलों से कुछ कहती जाती है। तट पर एक गुलाब सोचता,...

आसमान में उड़ते पक्षी - बालकृष्ण राव | Aasmaan Mein Udate Pakshi - Baalkrishn Raav

छोटा था, पर सुखकर था वह, तरुवर का मेरा आवास। उसमें ही मिलता था मुझको, जग के सभी सुखों का भास।। सदा प्रसन्नचित रहता था, होता कभी न दुखी, उदास...

पलक पाँवड़े - अयोध्या सिंह उपाध्याय | Palak Paanvare - Ayodhya Singh Upadhyaya

आज क्‍यों भोर है बहुत भाता । क्‍यों खिली आसमान की लाली ॥ किसलिए है निकल रहा सूरज । साथ रोली भरी लिए थाली ॥। इस तरह क्‍यों चहक उठीं चिड़ियाँ ...

लौट चलें प्रकृति की ओर - व्यग्र पाण्डे | Laut Chalen Prakrti Ki Or - Vyagra Pandey

लौट चलें फिर से हम  माँ प्रकृति की ओर । पेड़ों की पंचायत जहाँ  नाँच रहे हों मोर ।। नदी-पहाड़ जंगल की शोभा   झरनों का हो शोर । जहाँ साँझ मंदि...

समुद्र - सीताकांत महापात्र | Samudra- Sitakant Mahapatra

समुद्र का कुछ भी नहीं होता । मानो अपनी अबूझ भाषा में कहता रहता है जो भी ले जाना हो ले जाओ जितना चाहो ले जाओ फिर भी रहेगी बची देने की अभ...

मेघ आए - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना | Megh Aaye - Sarveshvar Dayal Saxena

मेघ आए कविता मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के। आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली, दरवाजें-खिड़कियाँ खुलने लगी गली-गली, पाहुन ज्यों आए-हों गा...

हम पंछी उन्मुक्त गगन के - शिवमंगल सिंह सुमन | Ham Panchhi Unmukt Gagan Ke - Shivmangal Singh Suman

हम पंछी उन्मुक्त गगन के हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऐंगे। हम बहता जल ...

फूल और काँटे - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Phool Aur Kante - Ayodhya Singh Upadhyay 'Hariaudh'

फूल और काँटे कविता हैं जनम लेते जगत में एक ही‚ एक ही पौधा उन्हें है पालता। रात में उन पर चमकता चांद भी‚ एक ही–सी चांदनी है डालता। ...

एक बूँद - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ek Boond - Ayodhya Singh Upadhyay 'Hariaudh'

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूंद कुछ आगे बढ़ी सोचने फिर फिर यही मन में लगी आह क्यों घर छोड़ कर मैं यों बढ़ी। दैव मेरे भाग्...

पीपल - गोपाल सिंह 'नेपाली | Peepal - Gopal Singh 'Nepali'

पीपल कविता कानन का यह तरुवर पीपल युग-युग से जग में अचल, अटल ऊपर विस्तृत नभ नील-नील नीचे वसुधा में नदी, झील जामुन, तमाल, इमली, कर...

एक फूल की चाह - सियाराम शरण गुप्त | Ek Phool Ki Chaah - Siyaram Sharan Gupt

एक फूल की चाह उद्वेलित कर अश्रु-राशियाँ,               हृदय-चिताएँ धधकाकर, महा महामारी प्रचण्ड हो               फैल रही थी इधर उधर।...